January 24, 2020

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MERI ANMANI SI MANJILEN

न धन न सम्पति न कोई आलीशान सा मकान, और

न कारों का काफ़िला  !

सिवा इस सोच के कि मैं इस पतित पावन धरती मे बोया गया एक पौधा

अनगिनत सावन के झूले जिस पर लटकते अनगिनत बच्चे सोचते मुझमे

सायद हरा रहूं या भरा  !

स्वप्न की डाली से जूझते हर अनोखी रवि प्रकाश से

मै संभल रहा उस नीरद की छाओं में भी मै पिघल रहा

न है लेखनी कोई लेख सी और न सोच है अनेक सी और

न सलाहकार सिवाय इस सोच क की

“में इस कर्त्तव्य ने भूमि में किया गया एक कर्त्तव्य हूँ  !

”दृढ संकल्प्य कर सोचूं अनेक कर्त्तव्य इस कर्त्तव्य भूमि के लिए

इस छर्रे बदन में शामली सुरत देखु

अनेक स्वप्न पुनः दृढ संकल्प कर कर्त्तव्य करने की

के इक इक परमाणु में नया कुछ भरने की ललक दौड़ने को है  !कोई सवारी न मंजिलें है न रस्ते और न अपना सा कोई मेरे वास्ते इस सोच में की

“मै इस पुण्य युक्त भूमि मे किया गया इक पुण्य हूँ जो मुख्त पाप से परे पुकार रही

न कोई पास न कोई दूर”आज अकेला बैठा हूँ इस चिंतन में कल क्या होगा मेरे जीवन मैं  !

इस “दृढ” शब्द का उपयोग कर इक दृढ संकल्प सी मेरे जीवन छाया के “कलम” को अपना गुरु बनाया  !!

MERI ANMANI SI MANJILEN

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